Sunday, November 2, 2008

Chadikaaye

Maine Poocha , Aakhir hum chor to nahi
Phir bhi hamari Talasi Kyu Li Ja Rahi Hai,
To Daroga Sahab Gurrakar Bole,
Hamari Sarkaar Bhaymukt Sarkaar Ka Vaada Nibha Rahi hai,...........

Pait Me Ann Ho , Jeb TanaTann Ho,
To Chunav ladiye ladaiye
Peeche Khade Khade Mooh Mat Banaiye
Aage Badhkar Apni Sarkaar Banaiye.....

4 comments:

चण्डीदत्त शुक्ल said...

अरे सुरेश दा...देखिए, हमने आपको ब्लॉग में भी धर-दबोचा...हा हा हा हा...उम्मीद है कि आप अपने चण्डीदत्त को नहीं भूले होंगे. साइबर वर्ल्ड में दाढ़ी शुकुल को देखकर खुशी हुई...

ajaysingh said...

hello sir mera nam ajay hai aur mai veerpur bisen darjikuwna gonda ka rahne wala hu. neta ji par apki kavita badi achi lagi

ajaysingh said...

sir mai chahta hu ki gonda ke historical background par bhi ek kavita likhe

ajaysingh said...

शोरगुल सुनते हुए
गजले समझ में आ गयीं
वो खेल कूद की ललक
बढती उम्र ही खा गयीं

और फिर आ ही गए
दहशत भरे वो दिन
बचपन की बातें हो चलीं
बूढी बताये बिन

मौज मस्ती खूब की
सावन के झूले झूलकर
कितना दीवाना खुश हुआ
बूढों की बातें भूलकर

खेला किये सब भूलकर
जेठ की उस धूप में
सब दर्द हो जाते फ़ना
दादी की झूठी फूँक में

अब जिन्दगी बेख़ौफ़ सी
आई है करने को हिसाब
मुझको बताओ आज तक
तुमने पढ़ी कितनी किताब

मै भी तो हू बेख़ौफ़ सा
बस चूर अपने आप में
निकला निडरता को लिए
इस जिन्दगी के ताप में

दोस्तों अब २३ का हो चला हू... और जिन्दगी ने अपने रंग दिखने शुरू कर दिए है. ग़ज़लें समझ में आने लगी तो डर लगा शायद मै बड़ा हो गया. चूंकि अभी अभी बचपना गया है इसलिए यकीन मनो डर तो लग ही रहा है, लेकिन ..मान नहीं सकता क्योकि कुछ भी नहीं है मेरे पास, .. डर से लड़ने को.......... सिवाय हिम्मत के ............................

ajay singh veerpur bisen darjikuwna gonda